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1962 में चीन युद्ध के बाद यह अनुभव किया गया कि सीमाओं की सुरक्षा केवल बंदूकधारी जवानों द्वारा नहीं की जा सकती बल्कि इसके लिए एक स्वप्रेरित सीमावर्ती जनता का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। ऐसे में एक गैर पारंपरिक, विशेषता प्राप्त संगठन की आवश्यकता महसूस की गई जो दूर- दराज के असुरक्षित विपरीत इलाकों में जलवायु व भूद्रश्य में कार्य करते हुए भिन्न राज्यों की सीमावर्ती जनता को प्रेरित कर राष्टªीय सुरक्षा में योगदान दे सके। एस एस बी ¼विशेष सेवा ब्यूरो½ का गठन मार्च, 1963 में, सुदूर सीमावर्ती इलाकों में युद्ध के समय ''स्टे बिहाइंड रोल'' के द्वारा ''सम्पूर्ण सुरक्षा'' तैयारी को सुनि-िश्चत करने के उद््देश्य से हुआ था। यह दक्षिण असम, दक्षिण बंगाल, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों ¼अब उत्तराखण्ड½, हिमाचल प्रदेश, पंजाब के कुछ भागों तथा जम्मू व कश्मीर के इलाकों में प्रारम्भ की गई। बाद में इसका कार्य क्षेत्र मणिपुर, त्रिपुरा और जम्मू ¼1965½ मेघालय ¼1975½, सि-िक्कम ¼1976½, राजस्थान ¼1985½, दक्षिण बंगाल, नागालैण्ड और मिजोरम ¼1989½ में भी फैल गया और इसके अंतर्गत 15 राज्य समाहित हो गये। लगभग 80,000 गांवों में निवास करने वाली 5.73 करोड़ की जनसंख्या और 9917 किलोमीटर अंतर्राष्टªीय सीमा की रक्षा का दायित्व पूर्व काल में एस. एस.बी. को सौंपा गया था। एस.एस.बी. का मुख्य कार्य राष्टªीयता की भावना और सतर्कता उत्पन्न करना था। एस.एस.बी. ने लगभग दो लाख स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जो संगठन के ज्ञान चक्षु बनकर कार्य करते रहे। 

एस. एस. बी. के कार्य क्षेत्र में 10 एस एस बी डिवीजन 49 क्षेत्र, 117 उप क्षेत्र और 287 सरकिल सम्मिलित थे। जिसमें 32 समूह केंद्र 14 प्रशिक्षण केंद्र 3 भंडारण डिपो भी थे। अक्टूबर 1963 में महाबलेश्बर में Ýंटियर प्रशासनिक अधिकारी प्रशिक्षण केंद्र की शुरूआत के साथ देश के वि-िभन्न भागों में प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये गए। इसके अतिरिक्त गवालदम ¼उत्तराखण्ड½ में ग्रुप लीडर टªेनिंग स्कूल को भी स्थापित किया गया था। दो उन्नत प्रशिक्षण केन्द्र सरहान ¼हिमाचल प्रदेश½ हॉफलॉग ¼असम½ में स्वयंसेवकों के लिए भी आरम्भ किये गए। वर्ष 1990 तक एस एस बी के पास 7 प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र एवं 7 महिलाओं के उन्नत प्रशिक्षण स्कूल थे। ये प्रशिक्षण हिमाचलप्रदेश, पंजाब, जम्मू, उत्तर प्रदेश, उत्त्राी असम, उत्तरी तथा दक्षिणी बंगाल तथा नेफा ¼अरूणचल½ क्षेत्र के सीमावर्ती क्षेत्रों की जनता के लिए प्रदान किया गये थे। 

केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों के संसाधनों को समाहित कर एस.एस.बी. द्वारा सीमावर्ती जनता के जीवनस्तर को सुधारने का काम किया गया। सीमावर्ती जनता ने सड़कों की मरम्मत करने, पुल और नालियां बनवाने, टैंक और कुएं साफ करने, पानी के पाइप डालने, सार्वजिनक शौचालय बनवाने, खेल का मैदान, स्कूल की इमारत और सामूदायिक केंद्र के निर्माण हेतु अपना सहयोग प्रदान किया। एस.एस.बी. कार्मिकों ने गांव वालों को उनके घर पर ही वि-िभन्न योजनाओं का लाभ पहुंचाया। उन्होंने टेप रिकार्डर, 16 एम.एम. फिल्म प्राेजेक्टर और ग्रामोफोन का प्रयोग कर गांव वासियों को शिक्षित कर व प्रेरित किया। वे गांव वासियों के साथ रहे और उनकी दिन- प्रतिदिन की समस्याओं को सुलझाया। एकता और अखंडता एवं क्षेत्र के आर्थिक विकास पर विशेष जोर दिया गया। ग्रामवासियों को छोटे हथियारों के प्रयोग का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मरक्षा में दक्ष बनाया गया। एस.एस.बी. के प्रयासों का फल कालान्तर में देखने को मिला। बहुत संख्या में महिला स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया गया और इससे एस.एस.बी. के प्रयासों को संवर्धन मिला। एस.एस.बी. ने उन स्थानों की सीमावर्ती जनता को चिकित्सा सहायता प्रदान करने का संकल्प लिया जहां प्राथमिक स्वास्थय केंद्राे का  अभाव था। यह कदम सरकार के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ क्योंकि सीमावर्ती जनता को यह विश्वास हो गया कि भारतीय संघ का अंग बनना लाभ का सौदा है। 1998 तक एस.एस.बी. के चिकित्सा कर्मी औसतन 16 लाख मरीजों का इलाज प्रतिवर्ष कर रहे थे। 1989 में एस.एस.बी. ने पशुधन पर अपनी जीविका के लिए निर्भर ग्रामीण जनता के लिए पशुचिकित्सा सेवा का प्रारम्भ किया। एस.एस.बी. के पशुचिकित्सा कर्मियों ने पांच लाख पशुधन का इलाज, दूर-दराज के इलाकों में कैम्प लगाकर किया। एस.एस.बी. ने प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों भूमिकाओं का निर्वहन आदर्शात्मक रूप में करते हुए 'जनता के मित्र' के रूप में स्वयं को स्थापित किया जो सेवा, सुरक्षा, बंधुत्व के आदर्श वाक्य से प्रेरित था। जब भूकंप, बादल फटने, बाढ़ भूस्खलन के रूप में महामारी या आपदा आयी तो हमने सबसे पहले सीमावर्ती जनता की रक्षा की। एस.एस.बी. यह दावा कर सकती है कि महिलाओं के सशक्तीकरण और उद्दार करने वाला सबसे पहला बल था जिसने हथियारों का प्रशिक्षण देकर जागरूकता उत्पन्न्ा करने वाले कार्यØमों और विकासात्मक कार्याें द्वारा लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में अपना योगदान दिया। एस.एस.बी. ने अपने कार्य क्षेत्रों में सामाजिक ताने-बाने को सुद्रढ़ करते हुए, राष्टª के धर्मनिरपेक्ष परिवेश को अलंकृृत कर नवजीवन प्रदान किया। अरूणाचलप्रदेश में हिंदी के प्रचार का श्रेय एस.एस.बी. को जाता है। हमने अपने कार्यों और प्रयासों द्वारा कई युवाओं का न केवल विघटनकारी ताकतों के हाथों में जाने से बचाया अपितु उन्हें मादक पदार्थो और गलत आदतों के फंदे से भी छुड़याा।